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Thursday, September 18, 2014

कोई कहे की की हिन्दू मूर्ती पूजा क्यों करते हैं
तो उन्हें बता दें मूर्ती पूजा का रहस्य :-
स्वामी विवेकानंद को एक राजा ने अपने भवन में
बुलाया और बोला, "तुम हिन्दू
लोग मूर्ती की पूजा करते हो!
मिट्टी, पीतल, पत्थर की मूर्ती का.! पर मैं ये
सब नही मानता। ये तो केवल एक पदार्थ है।"
उस राजा के सिंहासन के पीछे
किसी आदमी की तस्वीर लगी थी। विवेकानंद
जी कि नजर उस तस्वीर पर पड़ी।
विवेकानंद जी ने राजा से पूछा, "राजा जी, ये
तस्वीर किसकी है?"
राजा बोला, "मेरे पिताजी की।"
स्वामी जी बोले, "उस तस्वीर को अपने
हाथ में लीजिये।"
राजा तस्वीर को हाथ मे ले लेता है।
स्वामी जी राजा से : "अब आप उस तस्वीर पर
थूकिए!"
राजा : "ये आप क्या बोल रहे हैं
स्वामी जी?
स्वामी जी : "मैंने कहा उस तस्वीर पर
थूकिए..!"
राजा (क्रोध से) : "स्वामी जी, आप होश मे
तो हैं ना? मैं ये काम नही कर सकता।"
स्वामी जी बोले, "क्यों? ये तस्वीर तो केवल
एक कागज का टुकड़ा है, और जिस पर कूछ रंग
लगा है। इसमे ना तो जान है, ना आवाज,
ना तो ये सुन सकता है, और ना ही कूछ बोल
सकता है।"
और स्वामी जी बोलते गए, "इसमें
ना ही हड्डी है और ना प्राण। फिर भी आप इस
पर कभी थूक नही सकते। क्योंकि आप इसमे
अपने पिता का स्वरूप देखते हो।
और आप इस तस्वीर का अनादर करना अपने
पिता का अनादर करना ही समझते हो।"
थोड़े मौन के बाद स्वामी जी आगे कहाँ,
"वैसे ही, हम हिंदू भी उन पत्थर, मिट्टी,
या धातु की पूजा भगवान का स्वरूप मान
कर करते हैं।
भगवान तो कण-कण मे है, पर एक
आधार मानने के लिए और मन को एकाग्र करने के
लिए हम मूर्ती पूजा करते हैं।"
स्वामी जी की बात सुनकर राजा ने स्वामी जी से

क्षमा माँगी।


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Wednesday, March 19, 2014

फकीर की रोटियां



ईरानी शासक शाह जूसा इतना सरल और परोपकारी था कि संत और फकीर भी उसका खूब सम्मान करते थे। उसकी पुत्री अत्यंत सुंदर और सुशिक्षित थी। अनेक राजाओं ने उससे विवाह की इच्छा जताई थी, पर शाह ने उन सबका प्रस्ताव यह कह कर ठुकरा दिया, 'मुझे पुत्री के लिए राजा नहीं कोई त्यागी पुरुष चाहिए।'

संयोग से कुछ समय बाद ही शाह को एक युवा फकीर मिला। शाह उससे बहुत प्रभावित हुआ और उसने उससे पूछा कि क्या वह शादी करना चाहता है?' फकीर ने हंस कर उत्तर दिया,' करना तो चाहता हूं पर मुझ फकीर से कौन अपनी लड़की की शादी करेगा?' शाह बोला,' मैं आपको अपना दामाद बनाऊंगा।' फकीर ने कहा,' कहां आप राजा, और दूसरी तरफ मैं, जिसके पास आज केवल तीन पैसे हैं। शाह ने कहा, 'जाओ, इन तीन पैसों से शगुन की कुछ चीजें ले आओ।' बड़ी सादगी के साथ शाह ने अपनी पुत्री का विवाह उस फकीर के साथ कर दिया।

शादी करके फकीर शाह की लड़की को अपनी झोंपड़ी में ले आया। फिर उसने पूछा, 'तुम मेरे साथ इस कुटिया में कैसे रहोगी?' लड़की ने कहा,'मेरी खुद ही मर्जी थी सादा जीवन बिताने की। लेकिन आपकी झोंपड़ी में रोटियों का ढेर देख कर मन में ग्लानि सी हो रही है। इतनी रोटियां किसलिए? क्या आपको कल पर भरोसा नहीं है?' फकीर ने उत्तर दिया,'सोचा कुछ रोटियां बचाकर रख लूं। कल काम आएंगी। 

लड़की बोली, 'अगर आप संग्रह की आदत छोड़ दें तो मैं आपकी झोंपड़ी को भी महल समझ कर रह लूंगी।' फकीर ने संग्रह न करने का प्रण किया और दोनो सादगी भरा चिंतारहित जीवन बिताने लगे।

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Wednesday, September 12, 2012

सिकंदर महान और डायोजिनीस


भारत आने से पूर्व सिकंदर डायोजिनीस नामक एक फकीर से मिलने गया. उसने डायोजिनीस के बारे में बहुत सी बातें सुनी हुयी थीं. प्रायः राजा - महाराजा पियासी फकीरों के प्रति ईर्ष्याभाव रखते हैं.

डायोजिनीस इसी तरह के फकीर थे. वह भगवान महावीर की ही तरह पूर्ण नग्न रहते थे. वे अद्वितीय फकीर थे. यहां तक ​​कि वे अपने साथ भिक्षा मांगने वाला कटोरा भी नहीं रखते थे. शुरूआत में जब वे फकीर बने थे, तब अपने साथ एक कटोरा रखा करते थे लेकिन एक दिन उन्होंने एक कुत्ते को नदी से पानी पीते हुए देखा. सोचा उन्होंने? "जब एक कुत्ता बगैर कटोरे के पानी पी सकता है तो मैं अपने साथ कटोरा लिए क्यों घूमता हूं इसका तात्पर्य यही हुआ कि यह कुत्ता मुझसे ज्यादा समझदार है जब यह कुता बगैर कटोरे के गुजारा कर सकता है तो मैं क्यों नहीं ? " और यह सोचते ही उन्होंने कटोरा फेंक दिया.

सिकंदर ने यह सुना हुआ था कि डायोजिनीस हमेशा परमानंद की अवस्था में रहते हैं, इसलिए वह उनसे मिलना चाहता था. सिकंदर को देखते ही डायोजिनीस ने पूछा - "तुम कहां जा रहे हो?"

सिकंदर ने उत्तर दिया - "मुझे पूरा एशिया महाद्वीप जीतना है."

डायोजिनीस ने पूछा - "उसके बाद क्या करोगे डायोजिनीस उस समय नदी के किनारे रेत पर लेटे हुए थे और धूप स्नान कर रहे थे सिकंदर को देखकर पियासी वे उठकर नहीं बैठे डायोजिनीस ने फिर पूछा -." उसके बाद क्या करोगे?

सिकंदर ने उत्तर दिया - "उसके बाद मुझे भारत जीतना है."

डायोजिनीस ने पूछा - "उसके बाद?" सिकंदर ने कहा कि उसके बाद वह शेष दुनिया को जीतेगा.

डायोजिनीस ने पूछा - "और उसके बाद?"

सिकंदर ने खिसियाते हुए उत्तर दिया - "? उसके बाद क्या उसके बाद मैं आराम करूंगा"

डायोजिनीस हँसने लगे और बोले - "जो आराम तुम इतने दिनों बाद करोगे, वह तो मैं अभी ही कर रहा हूं यदि तुम आखिरकार आराम ही करना चाहते हो तो इतना कष्ट उठाने की क्या आवश्यकता है मैं इस समय नदी के तट पर आराम कर रहा हूं तुम पियासी यहाँ आराम कर सकते हो. यहाँ बहुत जगह खाली है. तुम्हें कहीं और जाने की क्या आवश्यकता है. तुम इसी वक्त आराम कर सकते हो. "

सिकंदर उनकी बात सुनकर बहुत प्रभावित हुआ. एक पल के लिए वह डायोजिनीस की सच्ची बात को सुनकर शर्मिंदा भी हुआ. यदि उसे अंततः आराम ही करना है तो अभी क्यों नहीं. वह आराम तो डायोजिनीस इसी समय कर रहे हैं और सिकंदर से ज्यादा संतुष्ट हैं. उनका चेहरा भी कमल के फूल की तरह खिला हुआ है.

सिकंदर के पास सबकुछ है पर मन में चैन नहीं. डायोजिनीस के पास कुछ नहीं है पर मन शांत है. यह सोचकर सिकंदर ने डायोजिनीस से कहा - ". तुम्हें देखकर मुझे ईर्ष्या हो रही है मैं ईश्वर से यही मांगूगा कि अगले जन्म में मुझे सिकंदर के बजाए डायोजिनीस बनाए"

डायोजिनीस ने उत्तर दिया -.? "तुम फिर अपने आप को धोखा दे रहे हो इस बात में तुम ईश्वर को क्यों बीच में ला रहे हो यदि तुम डायोजिनीस ही बनना चाहते हो तो इसमें कौन सी कठिन बात है मेरे लिए सिकंदर बनना कठिन है क्योंकि मैं शायद पूरा विश्व न जीत पाऊं मैं. शायद इतनी बड़ी सेना पियासी एकत्रित कारखेलों कर पाऊं. लेकिन तुम्हारे लिए डायोजिनीस बनना सरल है. अपने कपड़ों को शरीर से अलग करो और आराम करो. "

सिकंदर ने कहा -. "आप जो बात कह रहे हैं वह मुझे तो अपील कर रही है परंतु मेरी आशा को नहीं आशा उसे प्राप्त करने का भ्रम है, जो आज मेरे पास नहीं मैं जरूर वापस आऊंगा लेकिन मुझे अभी जाना होगा क्योंकि मेरी यात्रा अभी पूरी नहीं हुयी है लेकिन. आप जो कह रहे हैं वह सौ फीसदी सच है. "




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Tuesday, September 11, 2012

फल खाने की अधीरता


आम के मौसम में बग़ीचे में बंदरों का खूब उत्पात रहता था. बहुत सारा फल बंदर खा जाते थे. इस बार मालिक ने बंदरों को दूर रखने के लिए कुछ चौकीदार रख लिए सुरक्षा के कड़े उपाय अपना लिए.
बंदरों को मीठे आम का स्वाद मिलना मुश्किल हो गया. वे अपने सरदार के पास गए और उनसे अपनी समस्या के बारे में बताया.
बंदरों के सरदार ने कहा कि हम भी इनसानों की तरह आम के बगीचे लगाएंगे, और अपनी मेहनत का फल बिना किसी रोकटोक के खाएंगे.
बंदरों ने एक बढ़िया जगह तलाशा और खूब सारे अलग अलग किस्मों के आम की गुठलियाँ किया एकत्र और बड़े जतन से उन्हें बो दिया.
एक दिन बीता, दो दिन बीते बंदर सुबह शाम उस स्थान पर जा कर देखते. तीसरे दिन भी जब उन्हें जमीन में कोई हलचल दिखाई नहीं दी तो उन्होंने पूरी जमीन फिर से खोद डाली और गुठलियों को देखा कि उनमें से पेड़ क्यों निकल नहीं रहे हैं. इससे गुठलियों में हो रहे अंकुरण खराब हो गए.
कुछ पाने के लिए कुछ समय तो देना पड़ता है!


संकलन - सुनील हांडा (आसपास की बिखरी हुई शानदार कहानियाँ)

Monday, June 11, 2012

वकील और दादी माँ


वकीलों को दादी माँ से ऐसे प्रश्न करने ही नहीं चाहिए थे जिनके उत्तर वे सुन न सकें। एक छोटे शहर की अदालत में अभियोजन पक्ष के वकील ने अपने पहले गवाह के रूप में एक बुजुर्ग दादी माँ को कटघरे में बुलाया।

उनके पास जाकर वकील ने उनसे पूछा - “श्रीमती जोन्स, क्या आप मुझे जानती हैं? “

दादी ने उत्तर दिया - “हां-हां क्यों नहीं मि. विलियम्स! मैं तुम्हें तब से जानती हूं जब तुम जवान थे। और यदि मैं साफ-साफ कहूं तो तुमने मुझे बहुत निराश किया है। तुम झूठे हो, तुमने अपनी पत्नी को धोखा दिया है, तुम लोगों से झूठ बोलकर उन्हें फुसलाते हो और पीठ पीछे उनकी बुराई करते हो। तुम अपने आप को तीसमार खां समझते हो जबकि तुम्हारे पास इतनी भी अक्ल नहीं है कि अपने आप को समझ सको। हां मैं तुम्हें जानती हूं मि. विलियम्स! “

वकील भौचक्का रह गया! जब उसे कुछ समझ में नहीं आया कि क्या करे, उसने बचाव पक्ष के वकील की ओर इशारा करते हुए पूछा - “श्रीमती जोन्स, क्या आप बचाव पक्ष के वकील को जानती हैं? “

दादी ने फिर उत्तर दिया - “क्यों नहीं, जरूर जानती हूं! मैं मि. ब्रैडले को उनकी जवानी के समय से जानती हू। वे आलसी, कट्टर और शराबी हैं। वे किसी से भी सामान्य संबंध नहीं रख सकते और उनकी वकालत पूरे राज्य में सबसे खराब है। यह कहने की बात नहीं है कि उन्होंने अपनी पत्नी को धोखा दिया है और उसके तीन महिलाओं के साथ संबंध रहे हैं जिसमें से एक तुम्हारी पत्नी है। हां मैं उसे जानती हूं! “

बचाव पक्ष का वकील सन्न रह गया।

यह सुनकर जज महोदय ने दोनों वकीलों को अपने नजदीक बुलाया और धीरे से कहा - “खबरदार जो तुम लोगों ने उस महिला से मेरे बारे में पूछा। मैं तुम दोनों को हवालात भेज दूंगा। “