Thursday, April 11, 2013

बात पीढियों की ....

जब बात पीढियों के बारे में चलती हैं ... हमेशा एक तर्क जो बहुत जोर से दिया जाता हैं कि ... आजकल की पीढ़ी किसी कि नहीं सुनती, घर के कामो में रूचि नहीं लेती, बुजुर्गो का ख्याल नहीं रखती .... बस हर वक्त अपनी बात ... अपनी जिद.

... और न् जाने क्या -2 सबके अपने तर्क .. और साथ में यह भी जोड़ा जाता हैं कि .. हम तो ऐसे नहीं थे (हकीक़त में उनके माँ -. बाप ने भी उन्हें वही कहा होता है ... जब वो छोटे थे, पर उसे कौन याद रखता है) .... आज की पीढ़ी को क्या हो गया हैं .. पर असल में ऐसा हैं क्या .. या सिर्फ अपनी जिम्मेदारी से बचने का यह कोई तरीका हैं .... जब बच्चा इस दुनिया में आता हैं .. वो कुछ सीख कर नहीं आता .. उसने सब कुछ यही सीखना होता हैं ... इसी दुनिया में .... इस दुनिया में उसे सीखाने वाला कौन हैं .. वो हैं ... पुरानी पीढ़ी .. .. तो क्या उसे सही से सीखाया नहीं जा रहा हैं या वो सीख नहीं रहा .. अगर वो सीख भी नहीं रहा तो भी इसमें दोष किसका हैं ... क्या इस प्रश्न का जवाब कभी ढूँढा गया ...

बात सीधी सी है .. कि ... अगर हम खुद अपने घरों में देखे तो ... हम बच्चो को कभी भी कुछ नया करने के लिए कितना प्रेरित करते हैं ... लेकिन इसका जवाब हमारे पास होता हैं कि ... क्या करे उसके पास समय ही नहीं हैं .... पर क्या समय का सदुपयोग करना हमने उन्हें सीखाया ... पता नहीं ...

इसके बाद .. हम कितनी बार बच्चो को .. घर में कोई आता हैं चाहे वो दूर परिवार के सदस्य ही हो उनसे मिलवाने को उत्सुक रहते हैं ... शायद बहुत कम - तर्क होता हैं समय खराब होगा बच्चो का ..... बच्चो का इन लोगो से क्या लेना देना ...

कितनी बार बच्चो को हम .. अपने साथ ... धार्मिक अनुष्ठानो में ले जाते हैं .... हाँ वहा तब जरूर ले जाते हैं जब पता हो कि बच्चे वहा नाच - गा सकते हैं .. अन्यथा यह सोचते हैं कि बच्चे वहा जाकर बोर होंगे ....... क्या मिलेगा ऐसे प्रयोजनों में जाकर ... हम है न यह काम करने के लिए ....

कितनी बार दूर के रिश्तेदारों के शादी - ब्याह आदि के आयोजनों में हम बच्चो को ले जाते हैं ... वहा तर्क यह होता है कि ... बच्चो को वहा कोई नहीं जानता ... वो क्या करेंगे ..

कितनी बार उनसे कोई बैंक / पोस्ट ऑफिस इत्यादि का काम करवाया ..... तर्क .. क्या जरूरत हैं बच्चो को यह सब करने की ...

कभी किसी परिजन के यहाँ दुर्घटना / देहांत इत्यादि हो जाते हैं तो ... कितनी बार बच्चो को साथ ले जाया जाता है ... तर्क वहा भी यही होता है कि .. ऐसे ग़मगीन माहोल में बच्चे क्या करेंगे ..

देखने में यह भी आता ही कि ... अधिकांश माँ - बाप बच्चो को ... रोमांचकारी खेलो को खेलने के लिए भी उत्साहित नहीं करते क्योकि उनमे चोट लगने के जोखिम भी होते हैं .. तर्क होता है कि चोट लग जायेगी - कौन देखभाल करेगा .. देखभाल करेंगे तो. उनका शेड्यूल परेशान हो जायेगा ...

और भी इसी तरह की बाते होंगी .... क्योकि सबके अपने अनुभव हैं ....

पर इन सबका असर कैसे दिखाई देता है आज की जिंदगी पर .. वो भी हम अब समझ रहे हैं ... जैसे कुछ ऐसा भी होता है .....

आजकल परिवार में बच्चो की सख्या 1 या 2 ही होती हैं .. मतलब वो अक्सर अपने में ही व्यस्त रहते हैं .... जब वो अपने में व्यस्त रहते है तो उन्हें अपनी आजादी ज्यादा अच्छी लगने लगती है .... और जब आजादी ज्यादा अच्छी लगने लगती है .... तब. उसके की रहस्यो बढ़ने लगती हैं ... जब रहस्य बढते जाते हैं ... तो दूसरे कैसे समझेंगे ... यह एक सवाल होता है .. इसके साथ ही अगर कोई दूसरा समझने की कोशिश करता हैं ... तो उसे रहस्य समझने समझने की जरूरत होती हैं ..... और जैसे ही दूसरा उसके रहस्य समझने की कोशिश करता हैं ... उसे लगता हैं कि जैसेउसकी आजादी पर कोई आक्रमण हो रहा है ... कोई उसके अधिकारों पर अतिक्रमण कर रहा हैं ... और फिर वो एकदम या तो अपने को असहाय समझ चुप होकर बैठ जाता हैं या फिर उग्र रूप में वापिसी हमला करता हैं ... इसी के चलते अपने जीवन साथी के साथ सामंजस्य बनाने में भी मुश्किल आती हैं ...

बात छोटी सी है ... कि जब हम उन्हें छोटी उम्र में खुद ही कभी उत्साहित नहीं करते अपने साथ ले जाने के लिए किसी से मिलने के लिए मिलाने के लिए ... तब वो बड़े होकर कैसे उन्ही कामो को पूरा करने / खुद करने कि कोशिश करेंगे ... परिणाम होगा .... आपसी टकराव ....

अंत में बात वही आती हैं कि ... हमने अपनी जिम्मेदारी सही से निभाई .... या बस नयी पीढ़ी को कोशना ही सही हैं ... बचने के लिए तर्क आसानी से दिए जा सकते हैं ... वैसे सब तर्क इसलिए होते है क्योकि कही खुद को बचाना होता हैं .. हम अपनी दिनचर्या में बदलाव से खुद भी परेशां हो जाते हैं ... इसलिए बच्चो को सब करने से रोकते हैं या कहे तो हम इस तरह से प्रस्तुत करते हैं कि उन्हें उस सब बातों को जाने की जरूरत नहीं ....... पर इंसान की जिंदगी में अनेक रंग होते हैं ... सुख दुःख दोनों होते हैं .......... तो क्या हम नयी पीढ़ी को वो सब सहने के लिए सही से तैयार कर रहे हैं .... या हर वक्त सहने के लिए हम हैं .. उन्हें सीखने की क्या जरूरत ...... सोचना हम सबको ही हैं ..

सबके अपने विचार हैं ... कोई भी इस बात को निजी तौर से अपने ऊपर न ले ... बस समाज की दृष्टि से ही इसे पढ़ा जाए .... यह सिर्फ मेरा सोचना हैं .. आप अपनी बता लिखिए ....






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