Friday, April 20, 2012

जैसी होगी सोच वैसी ही मिलेगी कामयाबी

जैसी होगी सोच वैसी ही मिलेगी कामयाबी

दृष्टिकोण का जीवन में बहुत महत्व है। सकारात्मक विचार सफलता पाने के लिए बहुत जरुरी है। डा नार्मन विंसेट पील ने अपनी किताब द पावर आफ पाजिटिव प्रंसिपल्स टूडे में लिखा है कि किसी भी काम को करने से पहले उसके प्रति सकारात्मकता का भाव रखना बहुत जरूरी होता है। अगर आपकी सोच ही आपका साथ नहीं देती तो आप कोई भी काम कर लें उसमें आपको यथासंभव जीत को कतई नहीं मिलेगी। जीतने के लिए चार चीजों को होना आवश्यक है पहला है बल दूसरा विवेक, तीसरा धर्म और चौथा नजरिया। अगर इन चारों में से कोई भी एक चीज कम है तो समझ लीजिए आपकी सफलता में संदेह है। जीतने वाले पीछे किए गए कर्मों से प्रेरणा लेते हैं और असंभव शब्द को संभव करने के नजरिए से देखते हैं। ध्यान में रहे कि गलती करना यह सीखने का एक भाग है। जाने माने लेखक शिव खेडा ने अपनी किताब यू केन विन में लिखा है कि अगर आप सोचते हैं कि आप जीत सकते हैं तो आप निश्चित ही जीतेंगे। असंभव को संभव करना ही जीतने वालों का काम है।
‘असंभव कुछ नहीं, संभव हर काम है

कठिन राहों से गुजर कर जीना ही तो जीने का नाम है’।

सकारात्मक होने का एक और उदाहरण मिलता है महाकाव्य महाभारत से। महाभारत में जब अर्जुन अपने बाणों की दिशा भीष्म पितामाह की ओर करता है तो उसके हाथ कांपने लगते हैं। उसके पास बल, विवेक, धर्म ये तीन चीज तो होती हैं लेकिन उसका नजरिया साफ नहीं होता। वो कौरवों की सेना को मोह वश अपने सगे संबंधी और प्रियजन समझने लगता है जबकि जो भी व्यक्ति कौरवों की सेना से युद्ध् कर रहा था वो अधर्म का ही साथ दे रहा था। चाहे वो श्वेत आत्मा भीष्म पितामाह हों, या गुरु द्रोणाचार्य। अर्जुन के नजरिये को सही दिशा देने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने गीता का उपदेश दिया। उन्होंने कहा यदि तुम कर्म से सही नहीं सोच सकते तो तुम ये युद्ध् भी नहीं कर सकते।

सफलता पाने का ये भी अर्थ नहीं कि आप गलत रास्तों को इख्तियार करके अपनी मंजिल की ओर बढ़ें। अपने कर्तव्य का सही पालन करना भी उतना ही आवश्यक है जितना कि अपने काम में जीत हासिल करना। कभी कभी असफलता मिलने पर हमारे अंदर हीन भावना पैदा हो जाती है और हमें अनेक नकारात्मक विचार घेर लेते हैं ऐसे समय में ये बाद सदा ध्यान में रखनी चाहिए कि कैसी भी परिस्थिति में जीतने वाले अपने आप को उबार लेते हैं। मन भटता है तो इंसान की सोच की दिशा भी भटक जाती है।

एक व्यक्ति एक प्रसिद्ध संत के पास गया और बोला गुरुदेव मुझे जीवन के सत्य का पूर्ण ज्ञान है। मैंने शास्त्रों का काफी ध्यान से मैंने पढ़ा है। फिर भी मेरा मन किसी काम में नही लगता । जब भी कोई काम करने के लिए बैठता हूँ तो मन भटकने लगता है तो मै उस काम को छोड़ देता हूँ । इस अस्थिरता का क्या कारण है ? कृपया मेरी इस समस्या का समाधान कीजिए ।
संत ने उसे रात तक इंतजार करने के लिए कहा रात होने पर वह उसे एक झील के पास ले गया और झील के अन्दर चांद का प्रतिविम्ब को दिखा कर बोले एक चांद आकाश में और एक झील में, तुमारा मन इस झील की तरह है तुम्हारे पास ज्ञान तो है लेकिन तुम उसको इस्तेमाल करने की बजाए सिर्फ उसे अपने मन में लाकर बैठे हो, ठीक उसी तरह जैसे झील असली चांद का प्रतिविम्ब लेकर बैठी है। तुमारा ज्ञान तभी सार्थक हो सकता है जब तुम उसे व्यहार में एकाग्रता और संयम के साथ अपनाने की कोशिश करो । तुम्हे अपने ज्ञान और विवेक को जीवन में नियम पूर्वक लाना होगा और अपने जीवन को जितना सार्थक और लक्ष्य हासिल करने में लगाना होगा। अपने मन को काबू में करके अपना स्वयं का विश्वास जीत कर ही सफलता के झंडे गाडे जा सकते है। विश्वास और सकारात्मक नजरिए से ही हर मुश्किल से सामना किया जा सकता है।